आज लोग सुनी सुनाई बातों पर विश्वास कर लेते हैं और अपने अपने विचार व्यक्त करने लगते हैं लेकिन उस पर इतिहास को पड़ने और समझने की जरूरत नहीं समझते हैं,

इसलिए आज हम आपको बताने से पहले कहना चाहेंगे कि आज किसी समूदाय या जाति धर्म के प्रति कुछ ग़लत बयानबाज़ी से बचना चाहिए! आज लोगो को ब्राह्मण समाज को गाली देना दोष देना आम बात बन गया हैं ।

आइए हम आपको बताते है कि क्या कहा और कब हुआ था ।

ये कहानी महिलाओं के स्तन ढकने की लड़ाई के बारे में है। ये कहानी किसी दूसरे मुल्क की नहीं, बल्कि भारत की है।

कब क्या हुआ? कैसे हुआ और कैसे चीजें सही हुईं ये सब बताते हैं।

दलित और निचली जाति (एझावा/नादर) की महिलाओं पर स्तन ढकने के लिए 'मुलक्करम' (Breast Tax) नामक कर 18वीं और 19वीं सदी में केरल की तत्कालीन त्रावणकोर रियासत में लगाया गया था। इस कुप्रथा के अनुसार, निचली जाति की महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों पर अपने ऊपरी शरीर को ढकने की अनुमति नहीं थी और ऐसा करने पर उन्हें टैक्स देना पड़ता था, जिसके विरोध में नंगेली नामक महिला ने अपने स्तन काट दिए थे।

मुख्य तथ्य:

  • स्थान: त्रावणकोर (आधुनिक केरल), मुख्य रूप से चेरथला (Cherthala) क्षेत्र।
  • समय: 18वीं-19वीं सदी (नंगेली का विरोध 19वीं सदी की शुरुआत में माना जाता है)।
  • उद्देश्य: जाति व्यवस्था को बनाए रखना, जहाँ निचली जाति के लोगों को उच्च जाति के सामने सम्मान में बदन खुला रखना पड़ता था।
  • टैक्स: कर की राशि स्तन के आकार के आधार पर निर्धारित की जाती थी।
  • विरोध: नंगेली के बलिदान (आत्मदाह) के बाद, बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जिसके बाद राजा को यह कर हटाना पड़ा।

यह कर केवल उन महिलाओं पर लागू होता था जो अपनी गरिमा की रक्षा के लिए कपड़े पहनना चाहती थीं। नंगेली की शहादत के बाद, वह स्थान मूलचिपरम्बु- स्तन वाली महिला की भूमि) के नाम से जाना जाने लगा

केरल के श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय में जेंडर इकॉलॉजी और दलित स्टडीज़ की एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. शीबा केएम बताती हैं कि

एक क्रूर राजा मार्थंड वर्मा का उदय 1729, मद्रास प्रेसीडेंसी में त्रावणकोर साम्राज्य की स्थापना हुई। राजा थे मार्थंड वर्मा। साम्राज्य बना तो नियम-कानून बने। टैक्स लेने का सिस्टम बनाया गया। जैसे आज हाउस टैक्स, सेल टैक्स और जीएसटी, लेकिन एक टैक्स और बनाया गया...ब्रेस्ट टैक्स मतलब स्तन कर। ये कर दलित और ओबीसी वर्ग की महिलाओं पर लगाया गया।

जितना बड़ा स्तन उतना बड़ा टैक्स त्रावणकोर में निचली जाति की महिलाएं सिर्फ कमर तक कपड़ा पहन सकती थी। अफसरों और ऊंची जाति के लोगों के सामने वे जब भी गुजरती उन्हें अपनी छाती खुली रखनी पड़ती थी। अगर महिलाएं छाती ढकना चाहें तो उन्हें इसके

बदले ब्रेस्ट टैक्स देना होगा। इसमें भी दो नियम थे। जिसका ब्रेस्ट छोटा उसे कम टैक्स और जिसका बड़ा उसे ज्यादा टैक्स। टैक्स का नाम रखा था मूलाक्रम।

आज भी कर्नाटक के स्कूल में मुस्लिम लड़कियां हिजाब पहनें या न पहनें, इस बात को लेकर सड़क से संसद तक लड़ाई जारी है। प्रोटेस्ट हो रहा है। विरोध में भी भगवा पहने लड़के प्रोटेस्ट कर रहे हैं।

महिलाओं के साथ पुरुषों पर भी नियम लागू यह फूहड़ रिवाज सिर्फ महिलाओं पर नहीं, बल्कि पुरुषों पर भी लागू था। उन्हें सिर ढकने की परमिशन नहीं थी। अगर वे कमर के ऊपर कपड़ा पहनना चाहें और सिर उठाकर चलना चाहें तो इसके लिए उसे अलग से टैक्स देना पड़ेगा। यह व्यवस्था ऊंची जाति को छोड़कर सभी पर लागू थी, लेकिन वर्ण व्यवस्था में सबसे नीचे होने के कारण निचली जाति की दलित महिलाओं को सबसे ज्यादा प्रताड़ना झेलनी पड़ी।

महिलाओं की छाती पर कपड़ा दिखा तो चाकू से फाड़ देते थे नादर वर्ग की महिलाओं ने कपड़े से सीना ढका तो सूचना राजपुरोहित तक पहुंच जाती थी। पुरोहित एक लंबी लाठी लेकर चलता था जिसके सिरे पर एक चाकू बंधी होती थी। वह उसी से ब्लाउज खींचकर फाड़ देता था। उस कपड़े को वह पेड़ों पर टांग देता था। यह संदेश देने का एक तरीका था कि आगे कोई ऐसी हिम्मत न कर सके।

नादर वर्ग की नांगेली ने दिखाया था दम 19वीं शताब्दी की शुरुआत में चेरथला में नांगेली नाम की एक महिला थी। स्वाभिमानी और क्रांतिकारी। उसने तय किया कि ब्रेस्ट भी ढकूंगी और टैक्स भी नहीं दूंगी। नांगेली का यह कदम सामंतवादी लोगों के मुंह पर तमाचा था। अधिकारी घर पहुंचे तो नांगेली के पति चिरकंडुन ने टैक्स देने से मना कर दिया। बात राजा तक पहुंच गई। राजा ने एक बड़े दल को नांगेली भेज दिया।

केरल जैसे शिक्षित राज्य में महिलाओं को ब्लाउज पहनने का अधिकार 150 सालों के संघर्ष के बाद मिला। नांगेली का त्याग निर्णायक साबित हुआ।

नांगेली ने स्तन टैक्स के लिए स्तन ही काट दिया राजा के आदेश पर टैक्स लेने अफसर नांगेली के घर पहुंच गए। पूरा गांव इकट्ठा हो गया। अफसर बोले, "ब्रेस्ट टैक्स दो, किसी तरह की माफी नहीं मिलेगी।" नांगेली बोली, 'रुकिए मैं लाती हूं टैक्स।' नांगेली अपनी झोपड़ी में गई। बाहर आई तो लोग दंग रह गए। अफसरों की आंखे फटी की फटी रह गई। नांगेली केले के पत्ते पर अपना कटा स्तन लेकर खड़ी थी। अफसर भाग गए। लगातार ब्लीडिंग से नांगेली जमीन पर गिर पड़ी और फिर कभी न उठ सकी।

नांगेली की चिता में कूद गया पति नांगेली की मौत के बाद उसके पति चिरकंडुन ने भी चिता में कूदकर अपनी जान दे दी। भारतीय इतिहास में किसी पुरुष के 'सती' होने की यह एकमात्र घटना है। इस घटना के बाद विद्रोह हो गया। हिंसा शुरू हो गई। महिलाओं ने फुल कपड़े पहनना शुरू कर दिए। मद्रास के कमिश्नर त्रावणकोर राजा के महल में पहुंच गए। कहा, "हम हिंसा रोकने में असफल साबित हो रहे हैं कुछ करिए।" राजा बैकफुट पर चले गए। उन्हें घोषणा करनी पड़ी कि अब नादर जाति की महिलाएं बिना टैक्स के ऊपर कपड़े पहन सकती हैं।

महिला ने ही महिला को परेशान किया नादर जाति कि महिलाओं को स्तन ढकने की इजाजत मिली तो एजवा, शेनार या शनारस और नादर वर्ग की महिलाओं ने भी विद्रोह किया। उनके विद्रोह को दबाने के लिए उच्च परिवार की स्त्रियां भी आगे आ गई। ऐसे ही एक कहानी सामने आती है जिसमें रानी 'अन्तिंगल' ने एक दलित महिला का स्तन कटवा दिया था।

यह तस्वीर GEORGE J THALIATH फाउंडेशन से मिली है। त्रावणकोर साम्राज्य में महिलाओं की क्या स्थिति थी इसे देखकर समझा जा सकता है।

इतना परेशान हो गए कि श्रीलंका भाग गए इस कुप्रथा के खिलाफ विद्रोह करने वाले लोग पकड़े जाने के डर से श्रीलंका चले गए। वहां की चाय बगानों में काम करने लगे। इसी दौरान त्रावणकोर में अंग्रेजों का दखल बढ़ा। 1829 में त्रावणकोर के दीवान मुनरो ने कहा, “अगर महिलाएं ईसाई बन जाएं तो उन पर हिन्दुओं का ये नियम नहीं लागू होगा। वे स्तन ढक सकेंगी।”

जल-भुन गए ऊंची जाति के लोग मुनरो के इस आदेश से ऊंची जाति के लोगों में गुस्सा भर गया, लेकिन अंग्रेज फैसले पर टिके रहे। 1859 में अंग्रेजी गवर्नर चार्ल्स ट्रेवेलियन ने त्रावणकोर में इस नियम को रद्द कर दिया। अब हिंसा करने वाले बदल गए। ऊंची जाति के लोगों ने लूटपाट शुरू कर दी। नादर महिलाओं को निशाना बनाया और उनके अनाज जला दिए। इस दौरान नादर जाति कि दो महिलाओं को सरेआम फांसी पर चढ़ा दिया गया।

अंग्रेजों के बढ़ते दबदबे से महिलाओं को मिली राहत अंग्रेजी दीवान जर्मनी दास ने अपनी किताब 'महारानी' में इस कुप्रथा का जिक्र करते हुए लिखा, “संघर्ष लंबा चला। 1965 में प्रजा जीत गई और सभी को पूरे कपड़े पहनने का अधिकार मिल गया। इस अधिकार के बावजूद कई हिस्सों में दलितों को कपड़े न पहनने देने की कुप्रथा चलती रही। 1924 में यह कलंक पूरी तरफ से खत्म हो गया, क्योंकि उस वक्त पूरा देश आजादी की लड़ाई में कूद पड़ा था।”

इतिहास से मिटाने की कोशिश NCRT ने 2019 में क्लास 9 के इतिहास की बुक से तीन अध्याय हटा दिए। इसमें एक अध्याय त्रावणकोर में निचली जातियों के संघर्ष से जुड़ा था। हंगामा हुआ। केरल के सीएम पिनाराई विजयन ने कहा, “यह विषय हटाना संघ परिवार के एजेंडे को दिखाता है।” इसके पहले CBSE ने भी 2017 में 9वीं के सोशल साइंस से ये वाला चैप्टर हटा दिया था। मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंच गया। कोर्ट ने कहा, "2017 की परीक्षाओं में चैप्टर, कास्ट, कन्फ्लिक्ट एंड ड्रेस चेंज से कुछ भी नहीं पूछा जाएगा।"

नांगेली को इतिहास बहादुरी की मूर्ति मानता है केरल के श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय में जेंडर इकोलॉजी और दलित स्टडीज की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ शीबा केएम कहती हैं, "ब्रेस्ट टैक्स का मकसद जातिवाद के ढांचे को बनाए रखना था।" नंगेली के पड़पोते मणियन वेलू कहते हैं कि मुझे नांगेली के परिवार की संतान होने पर गर्व है। उन्होंने ये फैसला अपने लिए नहीं, बल्कि सारी औरतों के लिए किया था। उनके त्याग से ही राजा को ये कर वापस लेना पड़ा था।

ये फोटो नांगेली के पड़पोते मणियम वेलू की है। वे कहते हैं कि मुझे नांगेली के परिवार की संतान होने पर गर्व है। यह फोटो बीबीसी ने 12 मई 2016 को छापी थी।

डॉ. शिबा कहती हैं कि नांगेली के बारे में जितनी चर्चा होनी चाहिए थी उतनी हुई नहीं। उन्होंने कारण बताते हुए कहा, “इतिहास हमेशा पुरुषों की नजर से लिखा गया है। पिछले कुछ दशकों में महिलाओं के बारे में जानकारी जुटाने का क्रम शुरु हुआ है। उम्मीद है कि नांगेली की वीरता और उनका त्याग लोगों के बीच पहुंचे।”

नांगेली ने अपने त्याग से क्रांति रची। उन्होंने एक शर्मनाक टैक्स को खत्म करने के लिए अपनी जान दे दी। केरल के मुलच्छीपुरम में उनकी एक मूर्ति लगाई गई है। जहां लोग जाते हैं सिर झुकाते हैं। लोग लाख भूलने या भुलवाने की कोशिश करेंगे, लेकिन नांगेली को भुलाया नहीं जा सकेगा।