यह कथन, जो अक्सर ओशो रजनीश के विचारों से संबंधित है, इस बात की आलोचना करता है कि कैसे धार्मिक अनुष्ठान (जैसे तीर्थ यात्रा, दान, या स्नान) पाप को छिपाने या मिटाने का एक तरीका बन गए हैं, जिससे व्यक्ति निर्भय होकर फिर से पाप करने को प्रेरित होता है।

मुख्य बिंदु,दिखावा:

यह धारणा कि धार्मिक कार्यों से पाप धुल जाते हैं, पाप को छिपाने के लिए दान या दिखावे का मार्ग प्रशस्त करती है।

नैतिक उत्तरदायित्व:

यह विचार पाप के परिणामों के लिए व्यक्तिगत जवाबदेही को कम कर सकता है, क्योंकि लोग सोचते हैं कि वे अनुष्ठानों से पापों को धो सकते हैं।

आलोचना: जो यह एक तर्क है कि धर्म पाप से मुक्ति का मार्ग खोजने के बजाय, अनुष्ठानों के माध्यम से पाप की निरंतरता को बढ़ावा देता है।

कुछ दृष्टिकोणों के अनुसार, पाप केवल बाहरी अनुष्ठानों से नहीं, बल्कि पश्चाताप और सही कार्यों (सच्चा परिवर्तन) के माध्यम से धुलते हैं, न कि फिर से पाप करने की स्वतंत्रता के रूप में।